कर्म ही धर्म: असम में संगठन के काम में जुटे आलोक शर्मा##

असम में संगठन के लिए जुटे आलोक शर्मा”“कर्म ही धर्म: असम में संगठन के लिए जुटे आलोक शर्मा”“भाषा, दूरी और चुनौती सब पर भारी .राजेन्द्र सिंह जादौनभोपाल / भारतीय राजनीति में ऐसे कई चेहरे उभरते हैं जो केवल पद और प्रचार के दम पर नहीं, बल्कि अपने निरंतर परिश्रम, संगठन के प्रति निष्ठा और जमीनी जुड़ाव के कारण पहचान बनाते हैं। भोपाल के आलोक शर्मा भी ऐसे ही एक नाम बनकर सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी कार्यशैली से संगठन के भीतर एक मजबूत और भरोसेमंद छवि तैयार की है। आज वही आलोक शर्मा मध्यप्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर असम की धरती पर संगठन को मजबूती देने के मिशन में जुटे हुए हैं, जहां हर दिन उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी होती हैं।भोपाल की राजनीति में अपनी पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं है, और अगर बात पुराने भोपाल की हो तो यह चुनौती और भी बढ़ जाती है। पुराना भोपाल सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद जटिल क्षेत्र माना जाता है। यहां विभिन्न समुदायों, परंपराओं और मुद्दों के बीच संतुलन बनाकर संगठन को मजबूत करना किसी भी नेता के लिए कठिन परीक्षा होती है। लेकिन आलोक शर्मा ने इस परीक्षा को केवल पार ही नहीं किया, बल्कि उसमें अपनी अलग पहचान भी स्थापित की।उनकी कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने राजनीति को केवल बड़े मंचों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने छोटे
-छोटे कार्यक्रमों, स्थानीय

बैठकों और कार्यकर्ताओं के साथ सीधे संवाद को प्राथमिकता दी। वे बूथ स्तर तक सक्रिय रहे और संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास करते रहे। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं के बीच उनका विश्वास बढ़ता गया और वे एक ऐसे नेता के रूप में उभरे जो हर परिस्थिति में साथ खड़ा रहता है।संगठन ने भी उनके इस समर्पण और मेहनत को पहचाना। यही वजह रही कि उन्हें भोपाल से सांसद का चुनाव लड़ने का अवसर दिया गया। यह अवसर केवल एक चुनावी जिम्मेदारी नहीं था, बल्कि यह संगठन के भीतर उनके प्रति विश्वास और उनकी राजनीतिक क्षमता का प्रमाण था। हालांकि चुनावी परिणाम चाहे जैसे रहे हों, लेकिन इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया कि आलोक शर्मा संगठन के उन नेताओं में शामिल हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है।आलोक शर्मा की सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संबंध है। वे उन नेताओं में नहीं हैं जो केवल भाषणों और मीडिया की सुर्खियों में सीमित रहते हैं। वे लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं, कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सुनते हैं और उन्हें हल करने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि कार्यकर्ता उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि अपना साथी मानते हैं।अब संगठन ने उनकी इसी क्षमता को देखते हुए उन्हें एक नई जिम्मेदारी सौंपी है असम में आगामी चुनावों के लिए संगठन को मजबूत करना। यह जिम्मेदारी किसी भी दृष्टि से आसान नहीं है। असम एक ऐसा राज्य है जहां भौगोलिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता अत्यधिक है। यहां की राजनीति भी स्थानीय मुद्दों, जनजातीय समीकरणों और क्षेत्रीय भावनाओं से प्रभावित होती है। ऐसे में किसी बाहरी राज्य के नेता के लिए वहां जाकर संगठन को मजबूत करना एक बड़ी चुनौती होती है।आलोक शर्मा इस चुनौती को पूरी गंभीरता और समर्पण के साथ स्वीकार कर चुके हैं। वे असम के काजीरंगा संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली गोलाघाट विधानसभा में लगातार सक्रिय हैं। यहां वे घर-घर जाकर लोगों से संवाद कर रहे हैं, स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं और संगठन की रणनीति को जमीनी स्तर पर लागू करने में जुटे हुए हैं।गोलाघाट क्षेत्र की अपनी विशेषताएं हैं। यहां के मतदाता स्थानीय मुद्दों के प्रति बेहद सजग रहते हैं और बाहरी नेताओं को आसानी से स्वीकार नहीं करते। ऐसे में आलोक शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को स्थानीय लोगों के बीच स्थापित करने की है। लेकिन वे इस दिशा में लगातार प्रयासरत हैं। वे स्थानीय संस्कृति को समझने की कोशिश कर रहे हैं, लोगों के साथ संवाद स्थापित कर रहे हैं और धीरे-धीरे अपने लिए एक स्थान बना रहे हैं।भाषा भी इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण बाधा है। असम में असमिया भाषा का व्यापक प्रभाव है और हिंदी भाषी नेता के लिए वहां संवाद स्थापित करना शुरुआत में कठिन हो सकता है। लेकिन आलोक शर्मा ने इस चुनौती से पीछे हटने के बजाय इसे सीखने का अवसर बनाया है। वे स्थानीय भाषा को समझने और उसमें संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लोगों के साथ उनका जुड़ाव और मजबूत हो सके।उनकी यह कोशिश यह दर्शाती है कि वे केवल औपचारिक राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि वास्तव में उस क्षेत्र को समझने और वहां के लोगों के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। यही वह गुण है जो किसी भी नेता को भीड़ से अलग करता है।इस पूरे राजनीतिक संघर्ष के बीच आलोक शर्मा का एक और पहलू सामने आता है उनकी आस्था और पारिवारिक जुड़ाव। चुनावी व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने अपने परिवार के साथ ऑनलाइन रामनवमी और अष्टमी पूजन किया। यह केवल एक व्यक्तिगत क्रिया नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि वे अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और अपनी परंपराओं को भी उतना ही महत्व देते हैं।उनकी सोच और कार्यशैली पर भगतव गीता का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। विशेष रूप से यह श्लोक उनके जीवन और कार्य के दर्शन को स्पष्ट करता है:“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का एक गहरा सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि मनुष्य को केवल अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। आलोक शर्मा इसी सिद्धांत को अपने राजनीतिक जीवन में अपनाते हुए नजर आते हैं। वे लगातार काम कर रहे हैं, बिना इस चिंता के कि परिणाम क्या होगा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी चुनाव में जीत का आधार केवल बड़े नेताओं की रैलियां नहीं होतीं, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन की मजबूती होती है। बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता, मतदाताओं के साथ सीधा संपर्क और मजबूत संगठनात्मक ढांचा ये सभी जीत की नींव होते हैं। आलोक शर्मा की रणनीति भी इसी दिशा में केंद्रित है।वे कार्यकर्ताओं को जोड़ने, उन्हें सक्रिय रखने और संगठन को एकजुट करने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। उनकी कोशिश है कि संगठन केवल कागजों पर मजबूत न दिखे, बल्कि वास्तव में जमीनी स्तर पर भी उसकी पकड़ मजबूत हो।अब सवाल यह उठता है कि क्या उनकी यह मेहनत रंग लाएगी? क्या गोलाघाट में संगठन को वह मजबूती मिल पाएगी जिसकी उम्मीद की जा रही है? यह सवाल अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन यह निश्चित है कि आलोक शर्मा अपनी ओर से कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं।भोपाल से लेकर असम तक का यह सफर केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि यह समर्पण, संघर्ष और विश्वास की कहानी है। यह दिखाता है कि राजनीति में वही नेता आगे बढ़ता है जो चुनौतियों से भागता नहीं, बल्कि उनका सामना करता है।आलोक शर्मा की यह यात्रा एक संदेश भी देती है कि संगठन के प्रति सच्ची निष्ठा, निरंतर मेहनत और जमीनी जुड़ाव ही किसी नेता की असली ताकत होती है। पद और प्रचार क्षणिक हो सकते हैं, लेकिन कार्य और समर्पण स्थायी पहचान बनाते हैं।अगर आलोक शर्मा इसी तरह अपने कार्य में जुटे रहते हैं, तो न केवल असम में संगठन को मजबूती मिलेगी, बल्कि उनका राजनीतिक कद भी और ऊंचा होगा। और शायद यही कारण है कि आज संगठन को गोलाघाट में जीत का भरोसा है और यह विश्वास जताया जा रहा है कि उनकी मेहनत व्यर्थ नहीं जाएगी।
